कवि ने नारी के यौवन से लेकर खूबसूरती की तो व्याख्या की है
परन्तु वृद्धा और कूबड होने की बात नहीं की है
नारी के शौर्य की गाथा की तो व्याख्या की है
परन्तु जो उसे नारी बनाता है उसके मासिक धर्म की बात नहीं की
नारी को नदियों की सी घुमावदार होने की तो व्याख्या की है
परन्तु उसके माहवारी के बहाव की बात नहीं की है
नारी को मर्दानी होने पर जश्न मानने की तो व्याख्या की है
परन्तु उसके जननी होने पर उत्सव के शोक की बात नहीं की है
नारी को चांद से मुखड़े के समान सुशोभित होने की व्याख्या की है
परन्तु आँखों के नीचे गड्ढों की बात नहीं की है
नारी को देवी मानकर मंदिर मे बैठाने की व्याख्या की है
परन्तु मासिक धर्म मे मंदिर न जाने की अनुमति की बात नहीं की है
बेटी को बेटे होने की उपाधि देने की व्याख्या तो की है
परन्तु बेटे को कभी बेटी बोलने की बात नहीं की है
सीता जी के अग्नि परीक्षा की तो व्याख्या की है
परन्तु बुद्ध के परिवार को छोड़ने पर ऊँगली उठाने की बात नहीं की है
द्रोपदी के मज़ाक की बात बोलने की तो व्यख्या की है
परन्तु पर उनको ससुराल मे सम्मान देने की बात नहीं की है
नारी को कविताओं मे , काव्यो मे और ग्रंथो मे तो महान होने की व्यख्या की है
परन्तु समाज मे सम्मान और हक देने की बात नहीं की है
नारी के बहारी शरीरिक बनावट की तो व्याख्या की है
परन्तु अंतरिक द्वन्द और पीड़ा की बात नहीं की है
जैसे आज भगवान और धर्म को अपने सहूलियत के अनुसार अपनाते है
वैसे ही सशक्त नारी को कवि बस अपनी पंक्तियों मे ही शामिल होने देते है न की जीवन मे ।